लेखक होने और लिखने के शौक में वही अंतर है जो नेता होने और नेतागीरी करने में है
व्यवस्था यूं बदली कि आदरणीय और बुद्धिजीवी होना लेखक की आवश्यक योग्यता बन गई। शासन को ऐसे लेखक बड़े भाते थे जो पाठकों के अभाव को सत्ता के प्रभाव से भरते थे।from Jagran Hindi News - editorial:apnibaat http://bit.ly/2H7cUuL
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